समोसा
बचपन में कई बार समोसा खाया । कब खाया कितनी बार खाया, इसका हिसाब लगाना कागज,कलम,दिमाग और समय की बर्बादी से ज्यादा और कुछ नहीं। वैसे भी हजम कर ली गई चीजों का हिसाब कब कौन देना चाहता है। हां पर समोसों की वो दुकान जहां हम अक्सर समोसे खाया करते थे मसलन साह जी का रेस्टोरेंट,अशोका होटल, बंसल रेस्टोरेंट,सबसे फेमस कन्हैया लाल का समोसा और कभी कभी गंगा भाई और अन्नी की दुकान..... इन सभी को इस मौके पर याद करके उस वक्त खाए गए समोसों का कुछ स्वाद वापस लौट रहा है। खाए गए समोसे और उनके बनाने वालों के प्रति मेरे दिल में आज भी इतने आदर की भावना साफ दर्शाती है कि समोसों का मैं कितना ऋणी रहा हूं...समोसों का ऋणी। हां....समोसो का कर्ज़दार।
ये कॉलेज के दिनों की बात थी, और आज कॉलेज से निकले पूरे सात साल होने को हैं। तब से अब तक इस पेट में जाने कितने समोसे मोक्ष पा गए हैं, पर आज शादी के बाद पहली बार मैं जान पाया कि समोसे का समोसा होना मेरे जीवन में कितने मायने रखता है।
ऑफिस से घर की तरफ निकलते हुए ऑफिस की उदासी,इनफिरिटी,इनसिक्यूरिटी, काम और दाम का टेंशन अक्सर साथ हो लेता है। आज भी जब मैं ऑफिस की सीढ़ी उतर रहा था तो ऑफिस साथ हो लिया और रास्ते भर मुझे मेरे छोटेपन का अहसास कराता रहा। पर आज सिर्फ ऑफिस ही नहीं कुछ और भी था जो कदमों को आगे बढ़ने से रोके जा रहा था, थके कदम आदतन घर पहुंच ही गए। बीवी ने दरवाजा खोला पर हम दोनों के चेहरे पर मुस्कुराहटें नहीं खिल पाईं। मैं अंदर दाखिल हुआ, कमरे का तापमान लिया,इधर उधर बिखरी उदासी को नजर किया, गीला तौलिया बिस्तर में पड़ा सील रहा था, चाय का एक जूठा कप ड्रेसिंग टेबल में कांच की कुछ बेतरतीब बिखरी चूडियों के बीच पड़ा अपने होंठो पर भिनभिनाती मक्खियां उड़ा रहा था...मैं अपने कपड़े बदलता उससे पहले मैं एक कदम किचन मैं बढ़ा और गांठ लगी छोटी से प्लास्टिक की पुड़िया शेल्फ पर आगे सरका दी। श्वेता शेल्फ से सटकर खड़ी करेले की पीठ छील रही थी, उसने मुड़कर नहीं देखा।
मैं आज एक बार फिर बड़ी उम्मीद से रास्ते की दुकान से समोसे लाया था महज़ दस रुपए में। हरी चटनी के साथ दो समोसे । श्वेता तीन दिनों से नाराज थी और मुझे समोसों पर पूरा यकीन था। हम दोनों को अपनी अपनी गलती का अहसास था पर जैसे हर नवविवाहित जोड़े में शुरूआती दो तीन सालों तक ईगो नाम की बीमारी के लक्षण दिखने में आते रहते हैं, हम दोनों भी उसी से पीड़ित थे। पर मुझे समोसो के उपचार पर पूरा भरोसा था।
बेड पर लेटे हुए मैं टीवी के चैनल बदल कर खुद को ऐसे व्यस्त रख रहा था जिससे जाहिर कर सकूं की मुझे उसका इंतजार नहीं है पर अंदर बहुत इंतजार था,बहुत, और समोसे से बहुत उम्मीद थी। तभी श्वेता चाय के दो प्यालों के साथ प्लेट में समोसे सजा कर ले आई। हम अगल बगल बैठे थे बीच में बस दो समोसो का फासला था....हर शुरूआत का तथाकथित जिम्मा जैसे अक्सर मर्द का ही होता है। मैंने हरी चटनी में डूबो कर समोसा श्वेता के चेहरे की ओर बढ़ाया , उसकी लाल बड़ी आंखे डबडबा गईं। समोसा आंसू में भीग कर और स्वाद देने लगा। वो रोते रोते समोसे खा रही थी और मैं अंदर ही अंदर जीत की खुशी से हल्का हो रहा था। ये आंसू अपनी नासमझी पर अफसोस के आंसू थे और जो अब सिर्फ उसकी आंखों में नहीं थे। हमने बहुत देर तक मिलबांट कर चाय की चुस्कियां और समोसे के साथ अपने सांझे आंसू रोए और जिंदगी का स्वाद लिया। और जब समोसे खत्म हुए हम एक दूसरे की बांहों में थे। और अब कमरे के हर उदास साए में जिंदगी मुस्कुरा रही थी।
महानगर दिल्ली के इस एकाकी जीवन में हम दो नवविवाहितों को समझाने वाला कोई नहीं, लड़ बैठते हैं तो सुलह कराने वाला कोई नहीं। पर अब जब भी झगड़ा होता और सुलह की कोई गुंजाइश दिखती तो समोसा कभी नाउम्मीद नहीं करता। दस रुपए में दो समोसे और साथ में दो कप चाय़, समझदार के लिए सिर्फ एक समोसा काफी है, और जब समझदार हमारे जैसे दो लोग हों तो दस रुपए में दो समोसे, खुशी खुशी जीने के लिए काफी हैं...........
मुकुल उपाध्याय