Saturday, July 26, 2014

                              तीन उंगलियाँ अपनी तरफ 




एक हमारा जमाना था। घर से निकलने के मौके ही कितने मिलते थे। कभी होली, दीवाली तीज़-त्योहार के मौके या कभी नई कक्षा में जाने पर स्कूल ड्रेस, कॉपी-किताब, बस्ता, पैन लाने के बहाने घर से बाहर निकलना होता और तब सामान से बचे रुपयों से बड़ी सावधानी से कुछ पैसे निकाल कर हम लड़कियों ने कभी एक- आध बार ही किसी रेस्टोरेंट में बैठकर चाट खाई होगी। उस पर भी बदकिस्मती से कभी कोई बेचारी किसी अपने की नज़रों से बचने में नाकाम रहती तो उसे दूसरे दिन स्कूल में उसकी सूजी हुई आंखों से आसानी से पहचान लिया जाता। तब सभी डरी हुई, मन ही मन आगे से ऐसा न करने की कसमें खाती। कभी बहुत जिद करके पिकनिक जाने का प्रोग्राम बना लेती तो मोहल्ले कि किसी दीदी को आया की तरह साथ कर दिया जाता। पिताजी को नौकरी में कभी इंसेंटिव या बोनस मिलता तो वो सिनेमा ले जाते। हम सभी आगे-आगे रहते। मां और पिताजी गडरिए की तरह पीछे-पीछे। सड़क पर अनुशासन के साथ चलना, बगैर ही-ही, खीं-खीं करते हुए चुपचाप सिनेमा देखना और अपनी तरफ से लिम्का , सोडा, पॉपकॉर्न किसी भी चीज की डिमांड न करना बल्कि जो दिलाया जाए उसे ही सिर झुकाए, जी पिताजी कहते हुए चुपचाप स्वीकार कर, मिल बांटकर खाने का पाठ घर से निकलने से पहले ही पढ़ा दिया जाता। गांधी जी, हाथी मेरे साथी, दादी अम्मा, जय संतोषी मां और ऐसी ही कुछ और शिक्षाप्रद फिल्मों की धुंधली-सी याद है। फिल्मों की कहानी तो अब याद नहीं लेकिन सिनेमाघर जाने की उत्सुकता अभी भी याद है। एक गहरी सांस छोड़ते हुए बालकनी में खड़ी मिसेज पाठक ने नीले आकाश में खोई अपनी निगाहें वापस पार्क की उसी बेंच में टिका दी जहां से उनके भीतर अपने जमाने में वो सब न कर पा सकने का अंसतोष गहरा हो रहा था।सामने कॉलोनी के पार्क पर एक प्रेमी जोड़ा एक दूसरे से सट कर बैठा था। मिसेज पाठक बेंच के पीछे से दो भिड़े हुए सिर देख सकती थी, पर दो चिपके हुए गाल, दो चिपके हुए कंधे और मिलन के आनंद से उपजी लयात्मकता में दो घुटनों के एक लय के साथ बार-बार टकराने का मनमोहक दृश्य उन्हें मन की आंखों से दिखाई दे रहा था। तभी घर के सामने से गुजरते भाजीवाले ने बालकनी की रैलिंग में झुकी मिसेज पाठक को आलू-प्याज के भाव बताए तो उन्हें अपनी स्थिति का ध्यान आया। पार्क के बेंच से झट लौटी निगाहें भाजी वाले से चार हुई। एक पल रुक कर रेहड़ी आगे बढ़ गई और मिसेज पाठक की निगाहें वापस पार्क की उसी बेंच की ओर। दो सिर अब भी वैसे ही चिपके हुए दिखाई दे रहे थे जैसे करीब घंटा भर पहले। बीच-बीच में चिपके हुए सिर ढलते हुए दो सूरजों की तरह बेंच में नीचे की ओर सरक जाते और मिसेज पाठक को बेंच की सिर्फ पीठ दिखाई देती, तो वो कुछ और बेकरार सी हो उचक-उचक कर कुछ और देखने की चाहत से भर जाती और उनकी स्मृतियों में दो चिपके हुए होंठों का लंबे चुंबन वाला दृश्य उभर जाता। जैसा उन्हें टीवी के चैनल बदलते हुए कभी कभार अंग्रेजी फिल्मों में दिख जाया करता था। दोपहर के एकाकी, नीरस क्षणों में ऐसे दृश्यों ने कई बार उन्हें एक नई ताजगी से भरा था। पर बहुत देर तक भी जब दो चिपके हुए सिर वापस उभर नहीं आए तो बेकरारी चिड़चिड़ाहट में, चिड़चिड़ाहट असंतोष में और असंतोष, क्रोध में परिवर्तित हो गया। अंतरात्मा जाग गई और भीतर के इंसान ने पाला बदल लिया।कैसा जमाना था वो और जो आज सामने है वो क्या है। ऐसी आजाद तबियत की,  जो मर्जी आए वो करो। न कोई शर्म न लाज न डर। देर शाम तक घर से बाहर रहो, घूमो, फिरो, मौज मारो, सड़कों-गलियों में बेरोकटोक घूमो, लड़कों के साथ बतियाओ, उनका हाथ पकड़ो और उनकी बांहों को अपने कंधों में पड़ जाने दो। मतलब कुछ भी कर गुजरो। ये भी कोई तरीका हुआ जीने का। पता नहीं कहां-कहां से आ जाते हैं। कैसे मां-बाप होते हैं। इनके बच्चे कहां जाते हैं, क्या करते हैं कुछ होश नहीं। और मिसेज पाठक तेजी से कमरे में दाखिल हो गई। टीवी पर न्यूज चैनल हसोड़ कार्यक्रमों की झलकियां दिखा रहे थे तो स्क्रॉल में अपहरण, लूटपाट, सामूहिक बलात्कार और सड़क हादसों की ख़बर तैर रही थी। कहीं पारिवारिक सीरियल्स के नाम पर जनता पर इमोशनल अत्याचार हो रहा था तो कहीं अपने-अपने धर्म, पंथों के धार्मिक एंबेसडर लोगों को अप्रत्यक्ष रुप से अपनी ही भक्ति करने के लिए प्रेरित कर रहे थे। कहीं पतला होने, बाल उगाने, गोरा बनाने वाले प्रोडक्ट लिए मुस्कुराती हुई खूबसूरत लड़कियां आ-जा रही थीं क्योंकि उनको इस तरह से मुस्कुराने के पैसे मिल रहे थे। कुल मिलाकर टीवी पर उतना रोमांचक, उतना दिलचस्प और लेटेस्ट कुछ भी नहीं आ रहा था, जितना कि मिसेज पाठक अभी-अभी बाहर बालकनी में छोड़कर आई थी। वे रुक-रुककर चैनल बदल रही थी। टीवी स्क्रिन से उठती उनकी निगाहें छत, दीवार, फर्श इधर-उधर टॉर्च की सीधी रोशनी के माफिक पड़ रही थी।साफ जाहिर था कि वर्षा प्रवास में सहवास के दौरान बाघ और बाघिन के परस्पर व्यवहार में आए अकस्मात बदलावों को समझने में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं थी। उन्होंने टीवी बंद किया और रिमोट को नीचे रखते हुए फिर तेजी से बालकनी की रैलिंग पर जा पहुंची। बाहर सबकुछ पूर्ववत था। पार्क..पार्क की बेंच और प्रेमी जोड़ा। वातावरण में अंधेरे के जाले धीरे-धीरे सघन हो रहे थे। मिसेज पाठक को बेंच के आसपास की हलचल से आभास हो आया था कि वो दोनों अभी भी वहां थे।ये इत्मिनान कर लेने के बाद की सबकुछ वैसे ही बदस्तूर जारी है, मिसेज पाठक किसी निर्णय को साथ लिए भीतर की ओर मुड़ी। उसी क्षण किचन में कुकर की सीटी का बज उठना, कोई बहुत बड़ा संयोग नहीं था। हां.. पर बहुत देर से भीतर चल रहे विचारों की उथल-पुथल में अपने निर्णय की ओर आगे बढ़ने के लिए मिसेज पाठक को किसी अदृश्य सत्ता की सांकेतिक सहमति जैसा ही कुछ लगा, किचन से आता कुकर की सीटी का स्वर। मिसेज पाठक ने अपने निर्णय में अंतरआत्मा की मुहर लगाई और मन ही मन तय किया कि वो जो कुछ भी करने जा रही हैं सर्वथा उपयुक्त है और बड़बड़ाते हुए वो झट अंदर हो गईं।ये भी कोई तरीका हुआ। बेशर्मी की भी कोई हद होती है। जवानी सिर्फ इन्हीं को आई, जैसे हम जवान न थे। पर मजाल की कोई कह दे। मैं तो कहती हूं अंधे तो मां-बाप हैं इनके। अरे मेरी बला से सारा शहर नंगा हो कर घूमे मुझे क्या। पर मैं अपने मोहल्ले में ये गंदगी बर्दाश्त नहीं कर सकती। हमारे बच्चे भी सयाने हो रहे हैं। क्या सीखेंगे। मर्यादा-संस्कार भी कोई चीज है। मिसेज पाठक ने अपनी सांसों को फूलता हुआ महसूस किया।अरे छोड़ो हमें क्या करना ।करे ना जो करना है..जाए ना, जंगल-झाड़ी। हमारी कॉलोनी क्यों गंदी करते हैं। मिसेज पाठक ने जो कहना था उसे अपने जेहन और जुबान में फोन की घंटी बजने तक साफ-साफ दोहरा लिया। तभी थाने से फोन उठा.... ‘ ‘ हैलो जी हां थाना कालकाजी.... और मिसेज पाठक ने अपनी सारी तकलीफ पूरे सरोकार के साथ बयान कर दी।169, डीडीए फ्लैट्स कालकाजी अंत में मिसेज पाठक को शिकायतकर्ता के तौर पर पता लिखाते वक्त थोड़ी घबराहट हो रही थी। पुलिस के लफड़े पूछताछ कहीं वो खुद ही मुसीबत में न पड़ जाए। खैर......उधो कर्मन की गति न्यारी। परमानंद के पल बीत चुके थे, अब पापों का फल भोगना बाकी था। प्रेमी युगल परस्पर सिर झुकाए शर्मिंदगी के साथ खड़े थे। पुलिस आ चुकी थी। वैसे पाप भी क्या थे। बछिया छोटी हत्या बड़ी। पुलिसवाले अब कई तरह के सवाल पूछ रहे थे। इल्जाम लगा रहे थे। आपका नाम बाप का नाम। बालिग है..नाबालिग है। क्या करते हो। कहां रहते हो। कहां पढ़ते हो। पता, ठिकाना, मकान नंबर, फोन नंबर। तभी पुलिसवाले ने लड़की से पूछा- उम्र क्या है तेरी। लड़की जो पुलिस के आते ही सूखे पोदिने की तरह मुरछा चुकी थी। रूप-रंग सब पहले ही खो चुकी थी। इस प्रश्न के पूछे जाते ही पूरी सूख गई। बस एक हाथ जड़ दे तो बिना चूं करे नाक,कान,मुंह,हाथ अंग-अंग बिखर जाए। हां पर लड़की थी, सो अब भी हरी लग रही थी और लड़का जो शायद अभी कुछ देर पहले तक अपने कंधे में तिरछी हुई लड़की को अपने साहसिक कारनामे सुनाकर रोमांचित कर रहा होगा और कंधे में सिर रखकर रोमांचित हो रही लड़की के मुंह से बीच-बीच में सच पर तुम्हें कुछ हो जाता तो जैसी बातें सुनकर अपने अंदर विशालता का अनुभव कर रहा होगा। अब वो फ्रिज में दो हफ्तों से पड़े पड़े सूख चुके निरवीर्य खीरे की तरह खड़ा था। लड़का था सो अभी भी खड़ा था। खड़ा रहना उसकी मजबूरी थी। खैर पुलिस ने पूछा तो पता लगा लड़की नाबालिग है और लड़के ने इसी साल 21 पूरे किए थे। पास खड़ी दिल्ली पुलिस की बाइक का इंजन पिछले बीस मिनट से चालू था। हैडलाइट की रोशनी और डग-डग-डग करता बाइक का स्वर आसपास के लोगों के लिए घटना और उसके पात्रों की रहस्यमयता बढ़ा रहा था। लोग घरों से झांक रहे थे। वातावरण में अंधेरे की कालिख इतनी बढ़ चुकी थी कि इस अंधेरे में अपराध और अपराधी ज्यादा संजीदा लग रहे थे। लोग गली में घरों के बाहर जमा होने लगे थे। ये कामकाजी लोगों के घर लौटेने का और अपनों के इंतजार में घर के लोगों का दरवाजे, खिड़कियों से बाहर झांकने-तांकने का वक्त था। गली से गुजरते घरों को लौटते हुए लोग हाथों में पकड़ी थैलियों में गर्मागर्म समोसे, इमरती के साथ, ये एक नया ज़ायका भी साथ लिए जा रहे थे। बच्चों की इक्का-दुक्का चुहलबाजियों के बीच आंटियों और उनकी कुलबुलाहट के छितरे बिखरे स्वर संगठित होकर एक धीमा-सा शोर बुन रहे थे। ठीक हुआ...ऐसा ही होना चाहिए था...कई दिनों से चल रहा था ये तो....किसके बच्चे हैं....14-15 की उम्र होगी मुश्किल से..देखो कितने छोटे हैं... पर पुलिस को खबर किसने की। जिसने भी किया एकदम ठीक किया-  अरे पूरी कॉलोनी का माहौल खराब कर रखा था..हिम्मत तो देखो...हां बिल्कुल...क्या कहा...सच..ये लो...आपको इतना भी नहीं पता...पर हां सच है..पर किसी ने तो खबर की होगी, जो पुलिस ऐन वक्त पर आ पहुंची..लेकिन पुलिस को खबर... तभी घर की सीढ़ियों से धड़ाधड़ नीचे गली में उतर आईं मिसेज पाठक की प्रखर वाणी ने लेजर बीम की भांति आवाज़ों की भीड़ में प्रवेश किया और आसपास बिखरी..हूं..हां..ये..वो की बिखरी आवाज़ों को अपने स्वर सूत्र में पिरोती चली गई। उनका स्वर और मुखर होता चला गया। अरे सब अपनी सोचते हैं..मोहल्ले के लिए सोचता है कोई।हमारी कॉलोनी है...कौन आ रहा है...कौन जा रहा है...हम नज़र नहीं रखेंगे तो कौन रखेगा।
सब पुलिस पर ही छोड़ दीजिए और खुद हाथ में हाथ धर के बैठे रहिए, हो जाएगा सब। इसीलिए तो इस देश में आए दिन इतना कुछ होता रहता है। सब पुलिस करेगी...सरकार करेगी..हम तो बस खबरें पढ़ेंगे.... अखबारों में छप जाने के बाद बम-ब्लास्ट की..रेप की..लूटपाट की.। अरे हमारे आसपास अगर हम नहीं नजर रखेंगे तो पुलिस भी कुछ नहीं कर सकती....हां मैंने किया था पुलिस को फोन.. एक पल रुककर मिसेज पाठक ने एक लंबा दम भीतर खींचा और वो फिर बोलती चली गईं।
भीड़ ने जल्द ही उन्हें अपना केंद्र स्वीकार कर लिया और सब उन्हें ऐसे सुनने लगे जैसे पहले कभी ना सुना गया हो। फिर क्या था कोई उनमें भविष्य की नेत्री देखने लगता कोई समाज सेविका, कोई उनकी वाणी की मुखरता की दाद देता, कोई व्यक्तित्व और निर्भिकता की। कोई सुझाव देती की इस बार मिसेज पाठक को कॉलोनी एसोसिएशन का अध्यक्ष तो बना ही देना चाहिए। दूसरी उसमें संशोधन करते हुए बोलती- अरे आप तो उनकी क्षमताओं को कम करके आंक रही हैं। हम तो इनमें भविष्य की निगम पार्षद की गुंजाइश देखते हैं और फिर सभी एक साथ हंसते हैं और चाय के सिप खिंचते हैं। बातों बातों में कब जाने मिसेज पाठक ने सबसे एक कप चाय पीने का आग्रह  कर डाला और कब जाने सभी एक के पीछे एक उनके पीछे उनके घर की सीढ़ियां चढ़ गए, जो सीधे मिसेज पाठक के ड्रॉईंग रूम में जा खुली। पुलिस उन दोनों को साथ लिए जा चुकी थी। और इधर अब सोफे में बैठी आंटियां चाय बिस्कुट के साथ आज की इस घटना की जुगाली कर रही थीं। ठीक भी था इतनी तारीफ की थी जिन्होंने उनका एक कप चाय का हक़ तो बनता ही था। मिसेज पाठक जिन्हें सारी सफलता का क्रेडिट जाता था और जिन्हें उनके भावी भविष्य के लिए इतनी सारी शुभकामनाएं मिल रही थी, इतना तो कर ही सकती थी। बस फिर क्या था लोग इधर-उधर की बातें करते और हर बार कही हुई घटना का संबंध आज की घटना से जोड़ते हुए मिसेज पाठक की तारीफ कर डालते।मिसेज पाठक अपनी तारीफ पर नजर चुराते हुए बिस्कुट की प्लेट आगे कर देती..लीजिए ना। अब बस कीजिए चाय ठंडी हो रही है। अरे मिसेज पंत शर्माइए नहीं, आप लीजिए ना। ये तो फर्ज था अपना और मिसेज पाठक फिर आगे बोलने लगतीं।समझ नहीं आता कि आखिर इन बच्चों के मां-बाप कैसे होंगे, जिन्हें इतना भी नहीं पता कि उनके बच्चे कहां जाते हैं। इतनी देर तक क्या करते हैं। अरे माना की जमाना वो नहीं रहा जो हमने जिया था। बदल रहा है सब लेकिन ऐसी भी क्या आजादी । संस्कार भी  कोई चीज है कि नहीं। बताइए मिसेज पंत। मिसेज पंत चाय का घूंट नीचे खींचते हुए.. हूं.. में सिर हिलाने लगी। मिसेज पाठक फिर किसी समाज सेविका की तरह मुखर हो चलीं थीं। उन्हें सिर्फ कोई सुनने वाला चाहिए था। वो बहुत कुछ कहना चाहती थीं। हाथ के इशारे से उन्होंने मैडम नाथ, जिन का ध्यान खिड़कियों में लगे नए स्टाइल के पर्दों पर था, को अपनी ओर किया...क्यूं आप ही बताईए मैं कुछ गलत कह रही हूं। आपके स्कूल में तो कई तरह के बच्चे आते होंगे। संस्कारी बच्चे अलग से पहचान में आ जाते हैं। और मैं तो इस मामले में और ढील नहीं देती। बच्चों से साफ कहा है मैंने की जो भी हो 7 बजे तक तो आपको घर में होना ही है। ये कहते ही सहज मिसेज पाठक की नज़र सामने दीवार घड़ी पर गई। घड़ी साढ़े सात बजा रही थी। तभी बहुत देर से बोलने का ठीक मौका देख रही मिसेज पंत ने कहा- कितने बच्चे हैं आपके। बस दो, मिसेज पाठक ने झट उत्तर दिया। छोटा पेपर देकर भाग गया अपनी मौसी के घर छुट्टियों में हल्द्वानी। और बड़ी बेटी है। बेटी का जिक्र करते हुए निगाहें फिर घड़ी की तरफ चली गईं। अब तक तो आ जाना चाहिए था। उन्होंने फिर आधे-अधूरे से स्वर निकाले। आज बड़ी देर कर दी इसने। देर से देर सात बजे तक तो घर पहुंच ही जाती थी। अभी-अभी कही अपनी बात की सत्यता को हिलता देख मिसेज पाठक ने आगे कहा- अरे मास कम्युनिकेशन कर रही है ना मेरी बेटी। कुछ ट्रेनिंग वगैरह चल रही है आजकल। शायद इसीलिए देर हो गई हो। नहीं तो.... और वो आगे बोलने लगी। मीडिया में है ना... ट्रिन..टिन..टिन..तभी मिसेज पाठक के घर की डोरबैल बज उठी। लीजिए शैतान का नाम लिया और शैतान हाजिर।आ गई बेटी..मिसेज पाठक एक झटके के साथ उठी और बातें करते करते दरवाजे की ओर बढ़ी। दरवाजा खोलते ही जो सामने था, उसका सामना मिसेज पाठक के लिए किसी आघात से कम नहीं था। अचानक ऐसा घटित हो जाना किसी मंचीय नाटक में भी विश्वसनीय नहीं लगता लेकिन जो घटित हो चुका था वो सामने था। सामने दिल्ली पुलिस का एक जाट खड़ा था। उसने एक 20-22 साल की लड़की को कंधे से हल्का रोशनी में सामने आगे बढ़ाते हुए कहा- ये आपकी बेटी है। लड़की मिसेज पाठक को दरवाजे में एक तरफ धकेलती हुई, तेजी से अपने कमरे में भाग गयी। मिसेज पाठक को कोई जवाब देते हुए नहीं बना पर उनकी आंखे खुली की खुली रह गईं। चेहरा जवाब दे रहा था। उनका मुंह खुला ही रहा और पुलिसवाले ने सारी कहानी बयां कर डाली...की फलां-फलां लड़के के साथ आपकी लड़की फलां-फलां पार्क में वो सब करते हुए पाई गई जो अभी इस देश की जनता खुले में होते हुए देखने की आदी सिर्फ फिल्मों में हुई है, हकीकत में नहीं। मिसेज पाठक का मुंह अभी भी खुला था और वो दरवाजे पर एक तरफ मुश्किल से टिकीं थी। अंदर सोफे में बैठी आंटियों के मुंह से निकले वाक्य आधे मुंह के अंदर आधे बाहर स्तब्ध रह गए। पुलिसवाला सीढ़ियों से नीचे उतर गया।संभाल कर रखो मैडम नहीं तो एक दिन साथ में बच्चा लेकर लौटेगी लाडली। मिसेज पाठक को जाते जाते बोले गए, ये शब्द झकझोर  गए। जब मिसेज पाठक दरवाजे से वापस कमरे में दाखिल हुई तब अगर संभव होता तो सोफे पर बैठी आंटिया सामने चाय के खाली पड़े प्यालों में खुद को छिपा लेती लेकिन इस परिस्थिति में मिसेज पाठक के सामने पड़कर उन्हें पानी-पानी होते नहीं देखना चाहती। अपनी अपनी जगह पर बुतों में तब्दील हो चुकी आंटियों को कुछ ऐसे ही विचार सूझ रहे थे।
मिसेज पाठक अपने दो कदमों में चार-छह कदम लांघ गई और ड्राइंग रूम से होते हुए सीधे वो अपनी बेटी के कमरे के पर्दे पर झपटी और भीतर दाखिल हो गई। बहुत सारे सवाल, चीख चिल्लाहट, दुहाईयों और घरेलु गालियों के बीच एक जोरदार तमाचे की आवाज़ अपने पीछे एक गहरी ख़ामोशी छोड़ गया और एक सवाल जिसके पीछे पर्दा पड़ा रहा कि तमाचे में गाल किसके थे और हाथ किसके क्योंकि सचमुच में जमाना बदल रहा था। बस इतना शुक्र था कि जब तमाचे की आवाज़ ड्रॉईंग रूम में गूंजी तो वहां सिर्फ चाय के आधे पिए प्याले और प्लेट पर कुछ बिस्किट शर्मिंदा थे । उन्हें खाने वाले जा चुके थे।

मुकुल उपाध्याय